पालघर : जिले मे हाल मे ही संपन हुए पालघर और दहानु नगरपरिषद के चुनावों मे भाजपा के हार का ज़ख्म भरा ही नही और अब वसई विरार महानगरपालिका मे भाजपा मे क्लेश देखने क़ो मिल रहा है.
पालघर ग्रामीण क्षेत्र मे चुनाव नतीजो के बाद भाजपा नेताओं के सोशल मिडिया अकाउंट पर एक दूसरे पर कटाक्ष देखने क़ो मिले तो किसी पुराने कार्यकर्ता क़ो महज एक कमेंट करने पर पार्टी से बाहर करने की खबर भी सामने आई.
एक समय पार्टी की रीढ़ माने जाने वाले पुराने और निष्ठावान भाजपा कार्यकर्ता आज खुद को हाशिए पर खड़ा महसूस कर रहे हैं। भाजपा के वही निष्ठावान कार्यकर्ता, जिन्होंने दिन-रात पार्टी के लिए पसीना बहाया, आज खुद को पार्टी में बेगाना महसूस कर रहे हैं।
धनबल और दल-बदलू नेताओं के बढ़ते प्रभाव ने जमीनी कार्यकर्ताओं की आवाज़ को दबा दिया है। दूसरी पार्टियों से निकल कर भाजपा मे प्रवेश ले रहे नेताओं के आगे भाजपा के पुराने कार्यकर्ता दम तोड़ते नज़र आ रहे हैं। वर्षों की निष्ठा अब बोझ बनती जा रही है और सत्ता की सीढ़ी उन्हीं को मिल रही है, जो कल तक भाजपा के विरोध में खड़े थे।
इसी आक्रोश की झलक उस वक्त देखने को मिली, जब प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण की गाड़ी को रोककर कार्यकर्ता ने विरोध-प्रदर्शन किया। सवाल साफ है- क्या पार्टी में समर्पण और संघर्ष की जगह अब केवल सत्ता और साधन ने ले ली है? कार्यकर्ताओं का आरोप है कि वर्षों की निष्ठा के बावजूद उन्हें निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखा जा रहा है, जबकि कल तक विरोधी रहे चेहरे आज संगठन में महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान हैं।
यह महज़ विरोध नहीं था, बल्कि संगठन के भीतर सुलग रही आग का इज़हार था। कार्यकर्ताओं का सीधा सवाल है-जब निर्णय पैसों और सिफ़ारिशों से होंगे, तो फिर ज़मीनी कार्यकर्ता किस लिए?
संघर्ष की कीमत अगर शून्य है, तो निष्ठा का क्या मोल? आज यह स्थिति पालघर जिले तक ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में चर्चा है- यह भाजपा मुक्त भाजपा बनती जा रही है या फिर विपक्ष युक्त भाजपा?
भाजपा को वसई–विरार में बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता शेखर धुरी ने नामांकन के आखिरी दिन भाजपा को राम-राम करते हुए हितेंद्र ठाकूर के नेतृत्व वाली बहुजन विकास आघाड़ी (बविआ) का दामन थाम लिया। मंगलवार को शेखर धुरी ने वसई–विरार महानगरपालिका चुनाव के लिए बविआ से अपना नामांकन पत्र दाखिल किया। उनके इस फैसले को भाजपा के भीतर गहरी नाराजगी और असंतोष का संकेत माना जा रहा है।
शेखर धुरी भाजपा के पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ता रहे हैं। नवघर ग्राम पंचायत काल में उन्होंने सरपंच पद संभाला, वहीं नगरपरिषद में नगरसेवक और शिक्षण सभापती जैसे महत्वपूर्ण दायित्व भी निभाए। वे एक उत्तम लेखक और साहित्यकार के रूप में भी जाने जाते हैं। आरएसएस की पृष्ठभूमि से आने वाले धुरी ने वर्षों तक भाजपा संगठन के लिए निष्ठा से काम किया। हालांकि, इस बार वसई–विरार महानगरपालिका चुनाव लड़ने की इच्छा के बावजूद उन्हें भाजपा की ओर से टिकट नहीं दिया गया। टिकट से वंचित किए जाने के बाद उनकी नाराजगी खुलकर सामने आई और अंततः उन्होंने बविआ का झंडा हाथ में थाम लिया।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पुराने और जमीनी नेताओं की अनदेखी भाजपा को लगातार महंगी पड़ रही है। शेखर धुरी का दल-बदल भाजपा के लिए सिर्फ एक नेता का जाना नहीं, बल्कि संगठनात्मक कमजोरी का बड़ा संकेत माना जा रहा है। बात सिर्फ शेखर धुरी की ही नही है बल्कि दहानु से लेकर वसई तक भाजपा मे कई नेता असंतोष है, जो कई तो पार्टी का खुलकर विरोध करते देखे गए और कई मौन रहकर अपने आप क़ो कोसते नजर आ रहे है.





