पालघर | “अपनी परंपरा और संस्कृति को सहेजना ही मेरा जीवन रहा है। तारपा की धुन के माध्यम से मैंने देव आराधना की और उसी का आशीर्वाद मुझे मिला,” ये भावुक शब्द हैं पालघर जिले के वाळवंडा गांव के वरिष्ठ आदिवासी तारपावादक भिकल्या धिंडा के। उनकी दशकों लंबी सांस्कृतिक साधना को सम्मान देते हुए केंद्र सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार से नवाज़ने की घोषणा की है। इस गौरवपूर्ण घोषणा से धिंडा परिवार सहित पूरे पालघर जिले में हर्ष और गर्व का माहौल है।
वर्तमान में 92 वर्षीय भिकल्या धिंडा पिछले 82 वर्षों से तारपा वादन कर रहे हैं। महज दस वर्ष की उम्र से शुरू हुई यह साधना उनके परिवार में लगभग 400 वर्षों से चली आ रही वंशानुगत परंपरा का हिस्सा है। आदिवासी संस्कृति का प्रतीक माने जाने वाले तारपा वाद्य को उन्होंने केवल बजाया ही नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाकर संरक्षित किया। देव पूजा, उत्सव, पर्व-त्योहार और सामाजिक आयोजनों में तारपा की गूंज के जरिए उन्होंने आदिवासी जीवनशैली और लोकसंस्कृति को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।

उत्कृष्ट तारपावादक के रूप में भिकल्या धिंडा की पहचान दूर-दूर तक है। उन्हें यह कला अपने पिता से विरासत में मिली, जिसे उन्होंने तारपा निर्माण और वादन—दोनों माध्यमों से निखारा। लगभग दस फीट लंबे तारपा का वादन उनकी विशिष्ट पहचान मानी जाती है। राज्य ही नहीं, देश के विभिन्न हिस्सों में उन्होंने अपनी प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया है। उल्लेखनीय है कि उन्होंने कई युवाओं को तारपा वादन का प्रशिक्षण देकर इस परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाया। तारपा स्वयं बनाकर वे आजीविका भी चलाते हैं।
पद्मश्री पुरस्कार की घोषणा के बाद जिल्हाधिकारी डॉ. इंदु राणी जाखड़ ने भिकल्या धिंडा का अभिनंदन करते हुए शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा, “आदिवासी संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए भिकल्या धिंडा ने अपना पूरा जीवन समर्पित किया है। उनका यह सम्मान पूरे पालघर जिले के लिए गर्व का क्षण है।”
आदिवासी लोककला के इस जीवंत विरासतधारी को पद्मश्री से सम्मानित किए जाने पर पालघर जिले और आदिवासी समाज में बधाइयों का तांता लगा है। उनके योगदान से तारपा वाद्य और आदिवासी संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है.






