चौथी मुंबई के दावे खोखले,पालघर की जमीनी हकीकत बदहाल

पालघर ; एक तरफ बुलेट ट्रेन, एक्सप्रेस-वे, बंदरगाह और चौथी मुंबई जैसे बड़े-बड़े विकास के दावे, दूसरी तरफ सड़क के अभाव में एक युवक की जान चली जाना पालघर जिले के जव्हार तहसील से आई यह घटना सिस्टम की हकीकत पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। मुंबई से करीब 100 किलोमीटर दूर बसे तिलोंडा (आंबेपाड़ा) गांव में 18 वर्षीय शैलेश मगन वागदड़ा की सिर्फ इसलिए मौत हो गई क्योंकि उसे समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका।
परिजनों के मुताबिक, शैलेश की तबीयत अचानक गंभीर हो गई थी और उसे तुरंत इलाज की जरूरत थी। लेकिन गांव तक कोई पक्की सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस पहुंच ही नहीं आ सकी। मजबूरी में ग्रामीणों ने पारंपरिक डोली बनाई और उसे कंधों पर उठाकर अस्पताल की ओर निकले। पहाड़ी और जंगल के रास्तों से करीब चार किलोमीटर का यह सफर उसके लिए जानलेवा साबित हुआ।

चार किलोमीटर का संघर्ष, रास्ते में टूटी सांसें

तिलोंडा गांव से मुख्य सड़क तक करीब साढ़े तीन से चार किलोमीटर तक आज भी कोई पक्का रास्ता नहीं है। बारिश और गर्मी—हर मौसम में हालात एक जैसे रहते हैं। चारपहिया वाहन तो दूर, कई बार दोपहिया भी नहीं जा पाती।
उसी दिन भी ग्रामीण शैलेश को डोली में लेकर चांभारशेत स्थित स्वास्थ्य केंद्र की ओर दौड़े। रास्ता फिसलन भरा और पथरीला था, ऊपर से तेज धूप। जब तक वे स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे, शैलेश की हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी। डॉक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया।


बरसों से अनसुनी मांगें


ग्रामीणों का कहना है कि वे सालों से सड़क और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग कर रहे हैं। कई बार प्रशासन को ज्ञापन दिए गए, स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन भी हुए, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला। काम आज तक शुरू नहीं हुआ।
गांव के लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी 3 से 4 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। बरसात के मौसम में तो हालात और बदतर हो जाते हैं और गांव का संपर्क बाहरी इलाकों से लगभग कट जाता है।


आक्रोश और आंदोलन की चेतावनी


शैलेश की मौत के बाद पूरे इलाके में नाराजगी फैल गई है। परिवार का आरोप है कि अगर समय पर सड़क होती और एंबुलेंस पहुंच पाती, तो उनके बेटे की जान बच सकती थी।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द से जल्द सड़क निर्माण का काम शुरू नहीं हुआ तो वे जव्हार तहसील कार्यालय पर बड़ा आंदोलन करेंगे। उनका कहना है कि यह सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि सिस्टम की लापरवाही का नतीजा है।

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