Boisar | उद्योगों का गढ़, सुविधाओं में पिछड़ा… सपनों का शहर खुद बेबस!.. पढ़े चौंकाने वाला सच..

पालघर जिले की औद्योगिक पहचान माने जाने वाला बोईसर, जिसे “सपनों का शहर” कहा जाता है, आज खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर है। देशभर की नामचीन कंपनियों का ठिकाना और लाखों लोगों को रोजगार देने वाला यह शहर बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जूझ रहा है। उद्योगों की चिमनियों से निकलता धुआं विकास की कहानी तो कहता है, लेकिन शहर की सड़कों, पानी की किल्लत, ट्रैफिक जाम और अव्यवस्थित सिस्टम हकीकत की अलग ही तस्वीर पेश करती है।
बोईसर एमआईडीसी एशिया की बड़ी औद्योगिक बस्तियों में गिनी जाती है। यहां हजारों छोटे-बड़े उद्योग संचालित हैं, जिनसे महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि देश के अलग-अलग राज्यों से आए लोग रोजी-रोटी कमाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि रोजगार देने वाला यही शहर खुद अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए तरस रहा है।

मूलभूत सुविधाओं का संकट

शहर के कई इलाकों में खराब सड़कों, अधूरी ड्रेनेज व्यवस्था और अनियमित पानी आपूर्ति की समस्या आम हो चुकी है। बारिश के दिनों में हालात और बिगड़ जाते हैं सड़कें तालाब बन जाती हैं, नालियां उफान मारती हैं और यातायात ठप हो जाता है। बढ़ती जनसंख्या के मुकाबले स्वास्थ्य, शिक्षा और सार्वजनिक परिवहन की सुविधाएं अपर्याप्त साबित हो रही हैं।

ट्रैफिक और अव्यवस्था से जूझता शहर

औद्योगिक गतिविधियों के कारण भारी वाहनों की आवाजाही लगातार बढ़ रही है, लेकिन सड़क चौड़ीकरण और ट्रैफिक प्रबंधन की दिशा में ठोस कदम नजर नहीं आते। स्टेशन रोड,मधुर होटल नाका, बस स्टैंड मार्ग, नवापुर नाका और एमआईडीसी क्षेत्र में रोजाना लंबा जाम लगता है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि योजनाएं तो बनती हैं, पर जमीन पर उनका असर दिखाई नहीं देता।

जनप्रतिनिधि कई, समाधान कम

बोईसर में जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों की कमी नहीं है। चुनावी मौसम में विकास के वादों की भरमार रहती है, लेकिन हकीकत में इच्छाशक्ति की कमी साफ झलकती है। नागरिकों का आरोप है कि उद्योगों से राजस्व तो भरपूर आता है, पर शहर के बुनियादी ढांचे पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। कभी किसी जनप्रतिनिधि को जनता की समस्याओ को लेकर जागरूक नही देखा गया. यहां के लोगो ने नेताओं और अधिकारियो का विकास होते जरूर देखा है पर शहर की हालात को सुधारने के लिए लालायित होते नही देखा.

नागरिकों की बढ़ती नाराजगी

स्थानीय सामाजिक संगठनों,कार्यकर्ता और मिडिया ने कई बार मूलभूत सुविधाओं को लेकर आवाज उठाई है। समय-समय पर ज्ञापन, आंदोलन और बैठकों के बावजूद ठोस सुधार नहीं हो पाया। लोगों का कहना है कि बोईसर को सिर्फ औद्योगिक हब के रूप में नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित शहर के रूप में विकसित करने की जरूरत है।

विकास की मांग

नागरिकों की मांग है कि शहर में बेहतर सड़कें, सुदृढ़ जल निकासी व्यवस्था, नियमित पानी आपूर्ति, आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं और प्रभावी ट्रैफिक प्रबंधन लागू किया जाए। साथ ही, उद्योगों से मिलने वाले राजस्व का एक छोटा हिस्सा स्थानीय विकास कार्यों पर प्राथमिकता से खर्च किया जाए।
आज जरूरत है कि “सपनों का शहर” कहलाने वाला बोईसर सिर्फ उद्योगों के लिए ही नहीं, बल्कि यहां रहने वाले लाखों लोगों के लिए भी एक बेहतर और सुविधाजनक शहर बने। वरना रोजगार देने वाला यह शहर यूं ही अपनी किस्मत को कोसता रहेगा।

शहर में कामदार कम, पोस्टरबाज नेता ज्यादा

बोईसर जैसे तेजी से विकसित हो रहे औद्योगिक शहर में आज एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है—जमीन पर काम करने वाले कम, लेकिन पोस्टर और बैनर पर दिखने वाले नेता ज्यादा हो गए है। हर गली-चौराहे पर जन्मदिन, स्वागत, अभिनंदन और धन्यवाद के बड़े-बड़े पोस्टर नजर आते हैं, मगर शहर की टूटी सड़कें, जाम से जूझती ट्रैफिक व्यवस्था और जल निकासी की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि विकास के दावे अक्सर होर्डिंग्स तक सीमित रह जाते हैं। सोशल मीडिया पर सक्रियता और प्रचार-प्रसार में ऊर्जा अधिक दिखाई देती है, लेकिन जब बात मूलभूत सुविधाओं की आती है तो ठोस कार्रवाई कम नजर आती है।
औद्योगिक नगरी होने के कारण बोईसर का महत्व लगातार बढ़ रहा है, मगर इसके अनुरूप शहरी नियोजन और आधारभूत ढांचे पर गंभीर काम की जरूरत है। लोगों का मानना है कि शहर को दिखावे की राजनीति नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले जनप्रतिनिधियों की आवश्यकता है। अब वक्त आ गया है कि पोस्टरबाजी से आगे बढ़कर शहर के वास्तविक मुद्दों—सड़क, पानी, सफाई, ट्रैफिक और स्वास्थ्य सुविधाओं—पर प्राथमिकता से ध्यान दिया जाए। तभी बोईसर सच मायनों में एक विकसित और व्यवस्थित शहर बन पाएगा।

आधे-अधूरे बोईसर–चिल्हार मार्ग की बदहाली पर नेता चुप,अधिकारी मस्त

बोईसर–चिल्हार मार्ग अपनी अधूरी और बदहाल स्थिति के कारण सुर्खियों में है। वर्षों बीत गए पर इस मार्ग का निर्माण आज भी अधूरा है, आज भी सड़क कई हिस्सों में 4 लाइन तो कही जगह 2 लाइन मतलब अब भी आधी-अधूरी पड़ी है। परिणामस्वरूप यह मार्ग दुर्घटनाओं का केंद्र बनता जा रहा है।
रोजाना हजारों मजदूर, स्कूली बच्चे, ग्रामीण और औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारी इसी रास्ते से गुजरते हैं। भारी वाहनों की आवाजाही के बीच गड्ढों और असमान सड़क के कारण दोपहिया चालकों को सबसे ज्यादा खतरा बना रहता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, लगभग हर दिन छोटे-बड़े हादसे हो रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग और जनप्रतिनिधि मौन साधे बैठे हैं।
जनता की मांग है कि बोईसर–चिल्हार मार्ग का कार्य शीघ्र पूरा कर गुणवत्तापूर्ण निर्माण सुनिश्चित किया जाए, ताकि रोज-रोज होने वाले हादसों पर रोक लगे और लोगों को सुरक्षित आवागमन मिल सके। अब देखना यह है कि नेता और प्रशासन कब जागते हैं और इस अधूरे विकास को पूरा करने की दिशा में ठोस कदम उठाते हैं।

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