आज बोईसर के सामने जरूरत पोस्टरबाजी की नहीं, बुनियादी सुविधाओं की है। जरूरत बड़े-बड़े दावों की नहीं, बल्कि मुसीबत में लोगों के साथ खड़े होने की है। जरूरत जन्मदिन के होर्डिंग की नहीं, बल्कि जरूरतमंद परिवार के दर्द बाटने की है। क्योंकि पोस्टर कुछ दिनों में उतर जाते हैं, लेकिन जनता के लिए किया गया काम वर्षों तक याद रहता है।
पालघर जिले के बोईसर शहर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में पिछले कुछ महीनों से एक नया राजनीतिक ट्रेंड तेजी से देखने को मिल रहा है। शहर के चौक-चौराहों, मुख्य मार्गों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों पर जगह-जगह बड़े-बड़े होर्डिंग और बैनर लगाए जा रहे हैं। इन पोस्टरों में नेताओं को ‘जनसेवक’, ‘जनसम्राट’, ‘लोकप्रिय नेता’, ‘सभी के चहेते’, ‘युवा नेता’ जैसे तमाम विशेषणों से नवाजा जा रहा है।
हालात यह हो गए हैं कि कई बार शहर के अलग-अलग कोनों में एक ही व्यक्ति के जन्मदिन या किसी कार्यक्रम के नाम पर इतने पोस्टर और होर्डिंग नजर आते हैं कि ऐसा लगता है मानो पूरे बोईसर में किसी बड़े जननेता का जन्मोत्सव मनाया जा रहा हो। यह अब केवल पोस्टर लगाने का ट्रेंड नहीं, बल्कि चेहरा चमकाने की राजनीतिक होड़ बनता जा रहा है।
जमीन पर जनसेवा कितनी, पोस्टर पर दावे कितने?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि पोस्टरों में खुद को जनसेवक और जनता का हितैषी बताने वाले इन चेहरों में से कितने लोग वास्तव में आम जनता की समस्याओं के समय जमीन पर दिखाई देते हैं? बोईसर की जनता लंबे समय से खराब सड़के , जलभराव, यातायात, बिजली, कचरा, नालियों, प्रदूषण और बुनियादी सुविधाओं जैसी समस्याओं से जूझती रही है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जनसेवा का असली पैमाना बड़े-बड़े पोस्टर हैं या फिर मुश्किल वक्त में जनता के बीच खड़ा होना?
जानलेवा बन रहे अवैध पोस्टर और बैनर
पोस्टरबाजी सिर्फ शहर की खूबसूरती खराब करने तक सीमित नहीं है। कई जगहों पर सड़क किनारे और रोड लाइट के खंभों पर लगाए गए बैनर और पोस्टर सुरक्षा के लिए भी खतरा बनते दिखाई दे रहे हैं। तेज हवा और बारिश के दौरान कई बैनर टूटकर सड़क पर गिर जाते हैं। इनके साथ लगी लकड़ी की फ्रेम, लोहे की तारें और कीलें सड़क पर बिखर जाती हैं। इससे दोपहिया वाहन चालकों के टायर पंचर होने और दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। स्थानीय स्तर पर ऐसे मामलों में वाहन चालकों को परेशानी होने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।इसके बावजूद बोईसर, सरावली, खेरेपाडा, सालवड समेत आसपास की ग्राम पंचायतों और संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
नियम सभी के लिए समान हैं तो फिर सार्वजनिक स्थानों पर बिना अनुमति लगाए जाने वाले बैनर और पोस्टरों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या राजनीतिक पहचान या स्थानीय प्रभाव के कारण नियमों को नजरअंदाज किया जा रहा है?
ग्राम पंचायतें कार्रवाई से क्यों पीछे?
अवैध पोस्टरबाजी के खिलाफ कार्रवाई की जिम्मेदारी संबंधित स्थानीय प्रशासन की है। लेकिन स्थानीय लोगों का सवाल है कि जब पोस्टर लगाने वालों में राजनीतिक दलों से जुड़े लोग, स्थानीय पदाधिकारी या प्रभावशाली चेहरे शामिल हों, तो क्या कार्रवाई करने में प्रशासन को राजनीतिक दबाव महसूस होता है?यदि ऐसा नहीं है तो फिर सार्वजनिक खंभों, सड़कों और अन्य स्थानों पर लगातार लग रहे पोस्टरों पर कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई देती? कानून अगर आम नागरिक के लिए है तो राजनीतिक और प्रभावशाली लोगों के लिए भी वही कानून लागू होना चाहिए।
बोईसर में बैनर प्रिंटिंग का बढ़ता कारोबार
दूसरी तरफ पोस्टर और बैनर की बढ़ती होड़ ने स्थानीय स्तर पर प्रिंटिंग कारोबार को भी तेजी से बढ़ावा दिया है। जन्मदिन, राजनीतिक कार्यक्रम, स्वागत, शुभकामनाएं, नियुक्तियां और अन्य आयोजनों के नाम पर बड़ी संख्या में फ्लेक्स और बैनर छप रहे हैं.शहर में बढ़ते इस कारोबार से प्रिंटिंग और संबंधित व्यवसायों को आर्थिक फायदा जरूर हो रहा है, लेकिन सवाल यह है कि इसका बोझ आखिरकार सार्वजनिक जगहों और शहर की व्यवस्था पर कितना पड़ रहा है?
बारिश में जनता परेशान, पोस्टर वाले नेता गायब?
हाल ही में पालघर जिले में भारी बारिश के कारण कई इलाकों में जनजीवन प्रभावित हुआ। जलभराव, सड़कें बंद होने, घरों में पानी घुसने और लोगों के फंसने जैसी परिस्थितियां सामने आईं। ऐसे मुश्किल वक्त में कुछ चुनिंदा नेताओं को छोड़ दिया जाए तो पोस्टरों में खुद को जनता का सबसे बड़ा हितैषी बताने वाले कई चेहरे आम लोगों की मदद करते हुए नजर नहीं आए। यहीं से पोस्टर की राजनीति और वास्तविक जनसेवा के बीच का अंतर साफ दिखाई देता है। जिस नेता के जन्मदिन पर लाखों रुपये के पोस्टर और होर्डिंग लगाए जा सकते हैं, क्या उसी तरह कुछ खर्चा जरूरतमंदों के सेवा में नहीं लगाया जा सकता?
पोस्टर से नहीं, काम से चमकता है चेहरा
राजनीति में प्रचार और जनसंपर्क कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब प्रचार इतना बढ़ जाए कि शहर का हर दूसरा खंभा और हर प्रमुख चौराहा पोस्टरों से ढक जाए, तब सवाल उठना जरूरी है। जनता को यह तय करने का अधिकार है कि कौन वास्तव में ‘जनसेवक’ है और कौन केवल पोस्टर पर जनसेवक दिखाई देता है।
आज बोईसर के सामने जरूरत पोस्टरबाजी की नहीं, बुनियादी सुविधाओं की है। जरूरत बड़े-बड़े दावों की नहीं, बल्कि मुसीबत में लोगों के साथ खड़े होने की है। जरूरत जन्मदिन के होर्डिंग की नहीं, बल्कि जरूरतमंद परिवार के दर्द बाटने की है। क्योंकि पोस्टर कुछ दिनों में उतर जाते हैं, लेकिन जनता के लिए किया गया काम वर्षों तक याद रहता है।
अब देखना यह है कि बोईसर में बढ़ती इस पोस्टरबाजी पर स्थानीय प्रशासन कब कार्रवाई करता है और जनता के बीच खुद को जनसेवक बताने वाले नेता कब पोस्टर से बाहर निकलकर वास्तव में जनता के बीच दिखाई देते हैं।






